
हिंदी की वेबयुगीन पीढ़ी अकारण भी कुछ बूढ़-पुरनियों के क्रोध का शिकार हो रही है. इस पर उद्दंड, हिंसक, बाजारू आदि होने के आरोप लगे हैं. कुछ स्वनामधन्य इसे निपट मूर्ख और आवारा पीढ़ी कह कर भी संतोष-लाभ कर रहे हैं. २५ से ३५ की उम्र वाली यह नई खेप अपने अध्ययन, अध्यवसाय और गुणवत्ता में ( कमउम्र की वजह से ही ) संभव है कहीं कुछ कम ठहरती हो, तो भी पुरानपंथियों के रवैये से यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसे हर युग में उसी तरह वेब युग में भी दरअसल विरोध पुराने खांचे/ ढर्रे/ मठ और मठाधीशों के अधीनस्थ न होने की नई सोच और जिद की वजह से ही ज़्यादा है.
नई खेप के लेखक पत्र-पत्रिकाओं में छपने के मोहताज नहीं रहे और मेरे ख़याल में यह इस युग में अर्जित की गई सबसे बड़ी आज़ादी है. लेखक का छोटा-सा ही सही, अब अपना मोर्चा है, जहां से, रघुवीर सहाय के शब्दों में, वह लड़ सकता है, शहीद भी. हालांकि कुछ उस्ताद लोग प्रिंट के शुद्ध कसाईबाड़े में आने की ललकार भी गाहे-बगाहे देते हैं. लेकिन वे यह नज़रंदाज़ करते हैं कि नया लेखक भी अपने स्पेस और पाठक के होने के अहसास से भरा है. वे पाठक जो पढ़ कर उसे अच्छी-बुरी राय देते हैं. लेखक-पाठक के बीच इतनी पारस्परिकता शायद ही पहले कभी रही हो.
कल तक जो महान लेखक इस वेब-माध्यम का नाम सुनते ही दांत छीहर कर देते थे, आज अपनी पत्रिकाओं और रचनाओं समेत ब्लॉगस्पॉट और ऐसी ही मिलती-जुलती जगहों पर आ रहे हैं. हालांकि इनमें से अनेक अभी भी इसे संज्ञान में लेना ज़रूरी नहीं समझते. मिसाल के तौर पर आदरणीय कवि और 'जलसा' संपादक असद ज़ैदी अपनी इस 'आत्मनिर्भर' पत्रिका के दूसरे अंक में 'सबद' पर छपी कई रचनाओं को छापने के बावजूद उसके प्रथम-प्रकाशित स्रोतों का नामोल्लेख नहीं करते. लेकिन वे इसी अंक में एक अन्य प्रिंट पत्रिका से ली गई रचना को छापते वक़्त उसका सादर उल्लेख करते हैं.
यह तो एक पहलू है. दो-एक बरस पहले तक जब यह वेब माध्यम साहित्यिक हलकों में संदिग्ध था, तब इसमें अपनी नई रचनाएँ छपवाने के नाम पर भी कई महानुभावों को प्राणांतक पीड़ा महसूस होती रही थी. अलबत्ता वे यह बहुत चाहते रहे कि विभिन्न पत्रिकाओं के पन्नों में दबी रह गई उनकी रचनाएँ यहां पुनर्प्रकाशित हो जाए.
यह तो एक पहलू है. दो-एक बरस पहले तक जब यह वेब माध्यम साहित्यिक हलकों में संदिग्ध था, तब इसमें अपनी नई रचनाएँ छपवाने के नाम पर भी कई महानुभावों को प्राणांतक पीड़ा महसूस होती रही थी. अलबत्ता वे यह बहुत चाहते रहे कि विभिन्न पत्रिकाओं के पन्नों में दबी रह गई उनकी रचनाएँ यहां पुनर्प्रकाशित हो जाए.
मुझे लगता है कि यह एक नए माध्यम और नयी पीढ़ी दोनों का तिरस्कार करने की कोशिश रही जो अपनी नाकामी की मुनादी अब ख़ुद कर रही है. रहा सवाल नए के बेहतर और बदतर होने का तो उसके फैसले एकतरफा और इतनी जल्दी क्यों ? नए का उत्साही होना सुना था लेकिन बूढ़-पुरनियों में तो समय पठार सरीखा धीरज दे जाता है !
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[ तस्वीर गूगल से ]

Sunday, 02 October, 2011
वेब ने सबको लिखने की स्वतन्त्रता दी है।
Sunday, 02 October, 2011
केवल भय है, जो उनसे ऐसा करवाता है...कि अपना
कुछ खो न दे कहीं, इस नयी बाढ़ में...
Sunday, 02 October, 2011
getting published makes u available to wider public who has no access to net even on net there is limitation.i strongly feel all good writers should try to get noticed so that readers are not deprived of good writings.you can have blog as well well magazines side by side.
Sunday, 02 October, 2011
कुछ लोग बदलावों के रोड रोलर को तब तक अनदेखा करते चलते हैं जब तक कि वह घहराता हहराता उन पर ही चढ़ने को आमादा नहीं हो जाता..कुछ आत्ममुग्ध तो रौन्द भी उठते हैं :)
Sunday, 02 October, 2011
आपने सही और सतही विवेचन किया है भाई! क्या आपको नहीं लगता यहां भी वही प्रिण्ट मीडियावाली गुटबाजियां, बाड़ेबाजी और रचनाओं के मुल्यांकन के स्थान पर मित्रों और नामों और सम्बन्धों को ही हाईलाईट किया जा रहा है...ईमानदारी यहां भी वैसी ही अघोषित बेइमानी के साथ धड़ल्ले से चलती है
Sunday, 02 October, 2011
नई खेप के लेखक पत्र-पत्रिकाओं में छपने के मोहताज नहीं रहे और यह इस युग में अर्जित की गई सबसे बड़ी आज़ादी है, सही है..
Sunday, 02 October, 2011
sahi batein hain bandhu!
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